मिट्टी- कल्पना, कलात्मकता और सौन्दर्यानुभूति का सरल, सहज माध्यम - मनोज शर्मा

16 Oct 2019 09:02:12 am

मिट्टी- कल्पना, कलात्मकता और सौन्दर्यानुभूति का सरल, सहज माध्यम - मनोज शर्मा
अल्लामा इकबाल ने क्या खूब कहा है- 
मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहे, 
कि दाना खाक में मिल कर गुलो-गुलजार होता है।"
   मैने महसूस किया कि छोटे बच्चों को सर्वप्रथम मिट्टी के साथ खेलने और अपने अनुसार आकार देने के लिए प्रेरित करना चाहिए। 
   " मिट्टी के बर्तन बनते देखते हुए यह भी महसूस किया कि किस प्रकार शिल्पकार मिट्टी को बड़े ही सरल,और सहज तरीके से चाक पर मिट्टी को रखकर बड़ी ही सावधानी से उसे भिन्न भिन्न प्रकार के रूप प्रदान करता है। बहुत ही हल्के और कभी भारी हाथों से संभालता भी है। कभी कभी हाथ हटते ही आकार ले रही मिट्टी डगमगाने लगती है जैसे किसी छोटे बच्चे को शुरुआती दिनों में चलना सीख रहा हो और अचानक डगमगा जाता है तभी हम अपने हाथों को लगाकर उसे संभाल लिया करते हैं। यह एक संस्कार भी है जब बर्तन बन के तैयार और पक कर मजबूत हो जाता है तो फिर उसे सुधार करना मुश्किल होता है। इसके लिए कलाकार पहले सुरुआत में ही बर्तन के अंदर बाहर अपने हाथों को लगा कर सही करते हैं।" (- कार्यशाला में चाक पर बनते बर्तन को देखकर आये कुछ विचार )
    मिट्टी का महत्व न केवल अन्न उपजाने के लिए ही नहीं , बल्कि मिट्टी से अनेक दैनिक उपयोग की वस्तुएँ और कलात्मक शिल्प भी गढ़े जाते हैं। यह एक माध्यम है अपनी भावनाओं को कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए। विरासत के अनुसार आंचलिक मांग के अनुरूप कुम्हार जाति के लोग मिट्टी के बर्तन,घड़े आदि उपयोग में आने वाली मूर्तियाँ या अन्य वस्तुएं बनाते थे जो आज भी वे अपनी परंपरा के अनुसार कार्य कर रहे हैं। लेकिन अब साज सज्जात्मक शिल्प के विकास के साथ टेराकोटा शैली के मजबूत शिल्प और वस्तुएं बनायीं जाने लगी हैं। 
    मैं खुद आजमगढ़ के जिस स्थान से हूँ वहाँ मिट्टी के बर्तनों को बनाने वालों की काफी संख्या है जिसके लिए आज भी निजामाबाद एक  ब्लैक पॉटरी के लिए प्रसिद्ध है। बचपन से देखा करता था घर के बगल में कुम्हार लोग घड़े,गुल्लक,नरिया,थपुआ, मटका,सुराही,ईंट, दिये, बच्चों के खेलने के लिए मिट्टी के खिलौने आदि बनाते थे। और उनके इस प्रकार के बर्तनों को पकाने के भी अंदाज अलग होता है जिसे आंवां बोलते है। और जब पक के बर्तन निकलते थे तो बहुत ही सुंदर और आकर्षक लगते थे। खैर यह तो उनकी परंपरागत कार्य था लेकिन आज इस प्रकार मिट्टी को लेकर काफी प्रयोग हो रहे हैं। कलाकार विभिन्न प्रयोगों से अपना योगदान दे रहे हैं।
मृदा शिल्पी अपने-अपने तरीकों से मिट्टी की गुणवत्ता के अनुसार तैयारी करते हैं। और और आकार देते हैं। इसके पीछे भी बड़ी मेहनत होती है जैसे मिट्टी का चुनाव करना, उसे काम के लिए तैयार करना, वस्तु को बनाने के उद्देश्य, नाप, आकार, और रंग की कल्पना करें:  अपनी परियोजना के लिए सर्वोत्तम विधि का निर्णय , चाक पर चढ़ाने से पकाने तक कि सभी योजनाएं एक तकनीकी के माध्यम से किया जाता है। 
   मिट्टी के काम करने वाले कलाकारों का कला-बोध भी आश्चर्यजनक होता है। उनकी सौंदर्य-दृष्टि देखते ही बनती थी। मिट्टी के खिलौने, सजावटी सामान और बर्तन हमारी कला दृष्टि को जाग्रत कर देने की क्षमता रखते हैं। दरअसल सच यह भी है कि कला का मोल समझने की दक्षता लोग खोते जा रहे हैं। कहीं न कहीं यह दुःख का विषय है।
हमारे कलाकार हमेशा हमे सचेत और सजग करते रहते हैं अपनी संस्कृति और सभ्यताओं के प्रति। अगर देखें तो कुम्हार, केवल कुम्हार नहीं है। वह लगातार हमारी स्मृतियों को जाग्रत करते रहते हैं कि हम मिट्टी के प्रति श्रद्धा को विस्मृत नहीं होने दें। वह हमारी पर्यावरणीय चेतना को आवाज देता है- ‘जागते रहो।’ मिट्टी में मिलना भी पुनर्जन्म की एक प्रक्रिया ही है।
    एक चेतावनी कबीर ने भी दिया , कबीर मिट्टी के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की और कह गए- ‘माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय, एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोय।’ इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह चेतावनी उनके लिए है जो प्रकृति को किसी भी प्रकार से नष्ट करने में लगे हैं।
  कलाकार तो मिट्टी को सृजन प्रक्रिया में लगाता है एक रूप प्रदान करता है, आकार देता है जिसे हम अपने घरों का हिस्सा बनाते है, पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग करते हैं। मिट्टी हमारा अस्तित्व है। 
मिट्टी को कलात्मक रूप और उसमें रंग भरने का कार्य कलाकार बख़ूबी करते हैं।
    हालही में लखनऊ में एक पोटर्स मार्केट लगी जिसमे देश के अन्य प्रदेशों से युवा पोटर्स आये उन्होंने मिट्टी में विभिन्न तकनीकी प्रयोग किये गए अपने स्टूडियों के पॉट को प्रदर्शित किया जिसे काफी संख्या में लोगों ने पसंद किया और बड़ी संख्या में खरीदारी भी की। 
    इसी दौरान लखनऊ के वास्तुकला संकाय में एक कार्यशाला भी हुआ जिसमें पुणे के मनोज शर्मा ने वास्तुकला संकाय के बच्चों को बहुत सी मिट्टी के बर्तनों से जुड़ी हुई बारिकियों को सिर्फ बताया  ही नहीं बल्कि बच्चों के साथ करके दिखया भी। काफी संख्या में वहाँ के बच्चों ने इस कार्यशाला में भाग लिया। और सबमे एक एक पॉट का निर्माण भी इलेक्ट्रिक चाक के माध्यम से तैयार किये। 
 
रिपोर्ट-सत्यबन्धु

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