राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था और भारतीय सेना

28 Jul 2019 16:19:24 pm

 

राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था और भारतीय सेना

 

कृते

स्क्वाड्रन लीडर राखी अग्रवाल  (सेवा निवृत)

लखनऊ

 

 

राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था और भारतीय सेना

 

”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।”

 

“जन्मभूमि ही हमारी माता है । वह हमें उसी वात्सल्य भाव से पालती-पोसती है जैसे माता। इसका गौरव स्वर्ग से भी महान् है ।” 

 

मातृभूमि हमारा जीवंत और प्रत्यक्ष स्वर्ग है । देवता भी स्वर्ग को त्यागकर यहाँ जन्मधारण करने की अभिलाषा रखते हैं। प्रत्येक देश के मनुष्य अपनी जन्मभूमि की पूजा करते हैं, उसे महत्त्व तथा गौरव प्रदान करते हैं। क्या कोई ऐसा भी मनुष्य है जिसे अपनी जन्मभूमि प्राणाधिक प्रिय नहीं? संसार के समस्त महापुरुषों तथा कवियों ने देश-प्रेम के गीत गाए हैं । 

              

”गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे ।”

 

आमुख

 

२०० वर्षों तक जमे हुए ब्रिटिश शासन से विस्मरणीय-अविस्मरणीय बलिदानियों के कारण दासता का तिमिर विदीर्ण हुआ तथा स्वतंत्रता की अरुणिम-स्वर्णिम उषा में १५ अगस्त, १९४७ को हम हिंदुस्तानियों ने नेत्र उन्मीलित किए। हाँ, यह स्वतंत्रता पूर्ण हर्ष के रूप में हमारे साथ नहीं रह सकी, भारतमाता का अंग-विच्छेद हो गया। उस विभाजन ने आज भी कुछ ऐसी विकट समस्याएँ उपस्थित कर रखी हैं कि अशांति के बादल भारत की सीमाओं पर मँडरा रहे हैं । 

 

राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का वास्तविक अर्थ

 

किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्र हित की सूची में सर्वोपरि होती है!  राष्ट्र-राज्य की सीमा के भीतर, घरेलू राजनीति में अपनी इच्छानुसार आर्थिक नीतियां लागू करने के लिए, राजनीतिक प्रणाली चुनने के लिए एवं सामाजिक संगठन को सुव्यवस्थित रखने के लिए जिस स्वायतता की दरकार होती है, उसी के लिए किसी भी भू- भाग विशेष में सम्प्रभु आधिपत्य आवश्यक है! इनके आर्थिक- सामाजिक तथा सांस्कृतिक राष्ट्रीय हितों की हिफाजत, सैनिक सामरिक सुरक्षा के माध्यम से करने का प्रयत्न ही, राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था समझा जाता है । राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था व भारतीय सेना विषय विशेष पर अगर आज मेरी लेखनी मुखर हो उठी है तो यह बात दोहराने लायक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के आर्थिक और सामाजिक पहलू सैनिक पक्ष से कम महत्वपूर्ण नहीं समझे जा सकते। यह बात सामरिक शब्द में अंतर्निहित है। 

 

भारतीय सेना 

 

राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से सशस्त्र सेवओं पर ही होती है और उसमें भी सर्वोपरि और अहम है भारतीय सेना। सेना सिर्फ हमें बाहरी आक्रमण से ही नहीं बचाती बल्कि प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूस्खलन, बाढ़ के समय में भी बचाती है एवं आपदा प्रबंधन करती है। भारतीय सैन्य व्यवस्था विश्व की श्रेष्ठतम व्यवस्थाओं में से एक है जिसमें सीमित संसाधनों के द्वारा भी विजय प्राप्त करने की क्षमता है। भारत चीन युद्ध हो या फिर भारत पाक युद्ध, संयुक्त राष्ट्र की सेना में सात समुंदर पार जाना हो या, 1971 में बांग्लादेश के उदय में मदद,  देश के ही भीतर मिज़ोरम एवं अन्य पूर्वी राज्यों में अलगाववाद से भिड़ंत हो, कौन सा ऐसा मोर्चा है जहां हमारी सेना ने मुंह तोड़ जवाब नहीं दिया हो ? सेना ही ने सियाचिन की ठिठुरती ऊँचाई पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को उनके मोर्चे से बेदखल किया, वहीं कारगिल की चोटियों पर1999 में मुँह तोड़ जवाब दिया, कश्मीर में सीमा पार से होते छदम युद्ध में लगातार डट कर आतंक का सामना कर रही है हमारी अदम्य सेना । 

 

वर्तमान सुरक्षा परिवेश पर एक दृष्टि

 

सुरक्षा व्यवस्था से पहले वर्तमान सुरक्षा परिवेश को जानना आवश्यक है और यह भी कि भारत को सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत क्यों है? इसके भी दो पहलू हैं जिन पर सूक्ष्म दृष्टि डालना आवश्यक है: -

 

बाह्य सुरक्षा - पूरे विश्व में भू-स्थानिक राजनीति, कूटनीति और तकनीकी विकास के कारण राष्ट्रों की अपनी सुरक्षा में नए आयाम जुड़ते जाते हैं। एक साल पहले तक अमेरिकी राजनीति में आए परिवर्तन के बारे में किसने सोचा था? किसने सोचा था कि चीन इतनी विशाल आर्थिक शक्ति के रूप में उभरेगा? समय के साथ विवादों का स्वरूप और युद्धों के कारण बदलते जा रहे हैं। अब ये साइबर-संसार की ओर बढ़ने लगे हैं। भारत की सुरक्षा की अपनी चुनौतियां हैं। हमारे पास 4,900 कि.मी. की विवादित सीमाएं हैं, और इन्हें घेरे हुए दो ऐसे पड़ोसी जो परमाणु-ऊर्जा से सम्पन्न हैं। इन पड़़ोसियों ने एक प्रकार से भारत के विरूद्ध आपस में हाथ मिला लिया है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने पूरे अरूणाचल प्रदेश पर अपना दावा करना शुरू कर दिया है। चीन की भौगोलिक कूटनीति की चुभन भारत के लिए पैनी होती जा रही है। चीन ने पाकिस्तान को सैन्य सामग्री से लादना शुरू कर दिया है। ‘‘वन बेल्ट वन रोड’’ के माध्यम से चीन ने हमारे सभी पड़ोसी देशों को एक तरह से अपने साथ मिला लिया है। साथ ही जब तक अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप जारी रहेगा, अमेरिका पाक को सहायता देता रहेगा। पाक-रूस की बढ़ती सैन्य मिलनसारिता के बाद भारत अब रूस पर भी पूरा भरोसा नहीं कर सकता। पाक और चीन को छोड़कर, हमारे बाकी पड़ोसी ऐसी तस्वीर प्रस्तुत कर रहे है जिसमें सुधार हो रहा है जहां आशा एवं प्रगति का बोलबाला है। हमारे प्रत्येक घनिष्ठ पड़ोसी पिछले कुछ वर्षों में महत्‍वपूर्ण आंतरिक परिवर्तनों से गुजरे हैं तथा उन्होंने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने का विकल्प चुना है। इसकी वजह से बंग्‍लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यामार, अफ़गानिस्तान और मालदीव के साथ साझी सुरक्षा एवं समृद्धि पर साथ मिलकर काम करने की सामर्थ्य में वृद्धि हुई है। 

 

आंतरिक सुरक्षा - आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत में अनेक समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं।  वास्तव में आज के हालात में हमारी आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के बीच रेखा खींचना असंभव है। कुछ गलत नीतियों और राजनीतिक एजेण्डों के चलते उत्पन्न आन्तरिक हिंसा ने बाहरी खतरों की अपेक्षा आन्तरिक सुरक्षा को ज्यादा प्रभावित किया है। शहरीकरण एवं तेजी से सामाजिक परिवर्तन की वजह से उत्पन्न होने वाली आकांक्षाओं, जाति-संप्रदायगत वैमनस्‍य एवं जड़हीनता के कारण परंपरागत सामाजिक अवरोध कमजोर पड़ रहे हैं जो हमारे समाज में इस तरह की हिंसा पर अंकुश लगाते थे। बढ़ती बेरोजगारी, , राज्य-केन्द्र मतभेद एवं प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक मुद्दे का राजनीतिकरण करने की प्रवृत्ति ने कानून-व्यवस्था में झोल डाल दिया है। परंपरागत पुलिस व्यवस्था, या वामपंथी अतिवाद / आतंकवाद / अलगाववाद के लिए हमने जिस प्रकार की पुलिस व्यवस्था अपनाई है वह सटीक उत्तर नहीं है। इसके लिए उचित राजनीतिक पहल की जरूरत है। हिंसात्मक आन्दोलनों पर नियंत्रण पाने के लिए हमें पिछड़े लोगों के आर्थिक उत्थान और उनके सामाजिक और राजनीतिक कल्याण के लिए कार्य करना होगा। समुदायों के बीच उत्पन्न समस्याओं को ज्यादा लम्बे समय तक अटकाए रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, धार्मिक और जातीय दंगे, मन्दिर-मस्जिद विवाद जैसी समस्याओं को शीध्र सुलझाना चाहिए। यदि ऐसी समस्याएं जारी रहती हैं तो देश के वातावरण में केवल जहर ही घुलेगा।  दोनों ही परिवेश में जो मुख्य रक्षा चुनौतियां भारत के सामने आती हैं वह तीन प्रकार की हैं: - 

 

(1) हमारे शासक वर्ग में कूटनीतिक और सुरक्षा जागरुकता का अभाव - पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह के पत्र और कैग की 2012 और 2015 और सीओएएस की रिपोर्ट व नौसेना प्रमुख एडमिरल जोशी द्वारा अप्रत्याशित इस्तीफा और उसके बाद उनका सार्वजनिक बयान, कि भारतीय सशस्त्र सेनाएं धीरे-धीरे निष्क्रियता की शिकार हो रही हैं और सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की वजह से अपनी कार्यक्षमता खो रही हैं, से सुरक्षा के लिए जरूरी मुस्तैदी की खतरनाक स्थिति का पता चलता है। । पठानकोट आतंकवादी हमले के दौरान सुरक्षा बलों में समन्वय की कमी देखी गई जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करता है। इससे संकेत मिलता है वह यही कि भारतीय सेना अपने क्षरण के दौर में है और इसके लिए तात्कालिक रूप से संस्थागत सुधारों और पुनर्निर्माण के लिए काम करने की आवश्यकता है। सुरक्षा-व्यवस्था में सशक्त और प्रशिक्षित सैनिको का बड़ा महत्त्व है। हमें अपना सैन्य बल बढाना चाहिए। हमें अपने सीमित साधनों को चाहे विकास-कार्यो से हटाकर सेना पर व्यय करना पड़े, तो भी करना चाहिए क्योंकि जब आजादी ही नहीं रहेगी, तो विकास का क्या होगा ?

 

(2) राष्ट्रीय सुरक्षा पर पक्षपातपूर्ण राजनीति के चलते सुरक्षा बलों पर कटाक्ष करना - सीमा पर चलने वाली झड़पें और छोटे-मोटे विवादों में बढ़ोत्तरी हुई है। जहाँ तक भविष्य पर नजर जाती है, ऐसा लगता नहीं कि चीन और पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर युद्ध होगा। दो देशों के बीच होने वाले इस  प्रकार  के विवाद  कभी भी  सैन्य विजय या राष्ट्रीय सीमाओं में परिवर्तनों के लिए नहीं किए जाते, 

 

 

 

बल्कि इनके पीछे राजनीतिक कारण होते हैं। हमारे नेता दूरगामी कूटनीति या सुरक्षा नीतियों पर बात करने की बजाय आडंबरपूर्ण और भावनापूर्ण भाषणों तक सीमित रहते हैं। हमारे अधिकांश राजनेताओं का ध्यान अगले चुनावों की तैयारी तथा बजट और वोट-बैंक तक ही रहता है। 

 

(3) भारत का रक्षा-प्रबंधन- हमारे रक्षा-प्रबंधन में अनेक खामियां हैं। बढ़ती क्षेत्रीय असुरक्षा को देखते हुए रक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। एक बड़ी चुनौती मंत्रालयों में बैठे नौकरशाह है, रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, सुरक्षा उत्पादन विभाग, ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज बोर्ड में बैठे नौकरशाह और डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक इस स्थिति के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, जो सैनिकों की कार्बाइन, राइफल और मशीनगन जैसी सामन्य आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पाए हैं। कोई भी देश तब तक बड़ी शक्ति नहीं बन सकता, जब तक कि वह खुद में भारी-भरकम सैन्य-सामग्री का बड़ी संख्या में उत्पादन करने की क्षमता न रखता हो। 

 

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विकराल रूप लेती समस्याएं और उनके प्रभाव

 

हम आज अधिक चुनौतीपूर्ण सुरक्षा परिवेश का सामना कर रहे हैं, पहले की तुलना में अधिक गंभीर एवं अधिक जटिल। ये चुनौतियां हमारी स्थिरता, जीवन के तरीकों आधुनिकीकरण के प्रयासों तथा सामरिक    स्वायत्तता से संबंधित हैं। अतीत में हमारे लिए जो कारगर था वह अब संगत नहीं रह गया है। आज आतंकी गुट भर्ती करने, संचार करने के लिए तथा हथियार के रूप में भी प्रयोग करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज नया मीडिया परिवेश प्रखर हो गया है, सोशल मीडिया, ब्‍लॉग, 24x7 टीवी समाचार आदि ने बंटवारे की राजनीति को राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा में शामिल कर लिया है। चाहे वह पाक प्रायोजित आतंकवाद हो या बांग्लादेशियों की बढ़ती घुसपैठ! यह भी चिंतनीय है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर हमारी राष्ट्रीय वार्ता के कुछ भागों में भय के स्वर क्यों हैं? असुरक्षा की भावना क्यों उत्पन्न हो रही है? ऐसी स्थिति में देश की सुरक्षा व्यवस्था को और भी मजबूत बनाने की बड़ी आवश्यकता है, ताकि हम हर संकट का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सके । बाहरी ताकतें और अंदरूनी सामाजिक संकट देश की आर्थिक सुदृढ़ता, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता को हानि पहुंचाते हैं और राष्ट्रीय विकास पर असर डालते हैं इनमें मुख्य कारण है: -

 

 

1. समाज का धार्मिक ध्रुवीकरण

2. स्थायी रूप से आतंकवाद और जन विद्रोह 

3. भारत के बड़े भू-भाग में नक्सली गतिविधियां

4. सशस्त्र नागा विद्रोही

5. असम के अलगाववादियों का ISI और बांग्लादेश के कट्‌टरपंथी संगठनों से तालमेल 

6. कश्मीर के आतंकवादियों का पाकिस्तान के कट्‌टरपंथियों से धार्मिक और जातीय संबंध

समस्याओं के निवारण के कारगर उपाय

 

राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में सुधार के साथ ही इन तत्त्वों के बारे में आम आदमी को शिक्षित करना होगा, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले मामलों में शामिल करना होगा। आन्तरिक अशांति, विद्रोह, आतंकवाद और संगठित अपराध से जुड़े तत्त्वों को एक बार समूल कुचलना ही होगा चाहे सैन्य मदद ही क्यों न लेनी पड़ी। इन सब से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक प्रमाणित तंत्र स्थापित करना ही होगा । आतंकवादियों के क्षेत्रीय सम्यकों के खात्मे के लिए कुछ जरूरी सुविधाएं भी मुहैया करानी होंगी जैसे सुरक्षा बलों को संचार के आधुनिकतम साधन, खतरे की पूर्व चेतावनी के लिए बेहतर सूचना तंत्र, आवश्यक सैन्य-सामग्री आदि अति आवश्यक होगा प्रभावित क्षेत्रों में तटस्थ नागरिकों के संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाना तथा  शांति योजनाएं चलाना। इस सर्वमहत्वपूर्ण  आंतरिक सुरक्षा के लिये ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत’ को अपनाने की आवश्यकता है। ये सिद्धांत किसी आतंकी घटना को रोकने में हुई विफलता के लिये सुरक्षा प्रतिष्ठानों की जवाबदेहिता सुनिश्चित करेंगे। ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत’ एक दस्तावेज होता है जो सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये रणनीतिक एवं कार्यान्वयन संबंधी मामलों में मार्ग-दर्शन देता है। इस सिद्धांत में ऐसी अनेक परिस्थितियों का उल्लेख हो जिनमें रणनीतियों एवं युक्तियों का संचालन राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत के अनुसार किया जाए ना कि अफसरशाही तानाशाही और राजनेताओं की संकुचित सोच से । यह सुरक्षा पर संकट के समय त्वरित निर्णय लेने में अति  सहयोगी होगा। जिसके अनुसरण से सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित होने से आंतरिक सुरक्षा के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों से निपटने क लिये सही समय पर सटीक व  एकीकृत कार्रवाई संभव हो सकेगी। 

 

अंततः - विचार बिंदु

 

निष्कर्ष के तौर पर कहें तो भारत की सुरक्षा की जो चुनौतियां हैं, वे काफी दूर तक फैली हुई और अस्पष्ट हैं। भारत की सीमाओं की सुरक्षा के साथ ही हमारी आंतरिक सुरक्षा भी चिंतनीय है। देश इस समय एक संकट के समय से गुजर रहा है, देश की आजादी प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता । हमें उसकी सुरक्षा, अखण्डता व एकता को बनाये रखने के लिए सतत् जागरूकता की आवश्यकता होती है हमें अपने साधनों से सुरक्षा-व्यवस्था को गठित करना पड़ता है, ताकि हम किसी सकट का सामना करने के लिए सदैव तैयार रहे । सदैव याद रखिए कि - 

“एक राष्ट्र को तभी तक सुरक्षित समझा जा सकता है जब तक उसे अपने आधारभूत मूल्यों की कुर्बानी के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता ।”

उन मूल्यों को, जो उसके अस्तित्व के साथ जुड़े हैं, और उसकी राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है। राष्ट्रीय सुरक्षा का यह अमूर्त पक्ष सबसे कम समझा जाता है, और सम्भवतः यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

 

कृते - स्क्वाड्रन लीडर राखी अग्रवाल  (सेवा निवृत) 

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