विश्व संचार समाज दिवस और प्राणदायिनी प्रयोजनमूलक हिंदी

17 May 2019 07:18:23 am

17 मई विश्व संचार दिवस पर विशेष

 विश्व संचार समाज दिवस और प्राणदायिनी प्रयोजनमूलक हिंदी
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निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल ।
    भारतेंदु हरिश्चंद्र की ये पंक्तियां खुद में बहुत बड़ी बात समेटे हुए हैं।
 साथियों हमारे देश की भाषा हिंदी है ये हम सभी जानते हैं हिंदी हमारे देश में लगभग हर जगह बोली जाती है और विभिन्न क्षेत्रों में इसका स्वरूप भी भिन्न होते हुए तमाम बोलियों के रूप में हमारे बीच देखने को मिलता है। जैसे अवधी, भोजपुरी, बृज, हरियाणवी, पंजाबी ।हर जगह की बोली हिंदी के मूल प्रभाव को लिए हुए हिंदी के बहुआयामी रूप को परिलक्षित करती हमारे जन जीवन में रची बसी है।
  हिंदी हम सबने पढ़ी लिखी भी है पढ़ाई लिखाई के दौरान हिंदी के जिस रूप से हम परिचित होते हैं वो होती है हिंदी गद्य पद्य और व्याकरण। गद्य में कहानी, उपन्यास संस्मरण पत्र  विधाएं होती हैं जबकि पद्य में दोहे चौपाई गीत ,छंद आदि गेय शैली में काव्य रूप में हम पढ़ते हैं और व्याकरण जो हमारी हिंदी के गद्य पद्य दोनों रूपो के शिल्प विन्यास में चार चांद लगाने में अहम भूमिका निभाता है। 
 
यूं तो राजकाज की भाषा मे हिंदी को स्थान नहीं मिल सका है किंतु हिंदी का एक स्वरूप जिससे आम जनमानस  परिचित तो है किंतु उसके स्वरूप को किस नाम से जानते हैं ये शायद ज्ञात न हो। जी हां साथियों प्रयोजनमूलक हिंदी  ...  जो कि हमारे जन जीवन को इस तरह प्रभावित करती है जैसे बिन हवा पानी के हम हों। रोजमर्रा की जीवन से जुड़ी हर ज़रूरत में हम जिस हिंदी को प्रयोग में लाते है  जो सहज है सरल है और हमारी आदत में शामिल है वही तो है प्रयोजनमूलक हिंदी । इसका प्रयोग प्रशासनिक स्तर को छोड़कर हर जगह व्यापकता से देखने को मिलता है। संचार की पूरी व्यवस्था में प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या इंटरनेट की व्यापक दुनिया प्रयोजनमूलक हिंदी हर जगह प्राण फूंकती है। रेडियो टेलीविजन और सिनेमा में भी तो हमारे जीवन मे रची बसी यही हिंदी का प्रयोग होता है । उदाहरण के तौर पर मां लीजिए कि एक सर्वे ,या रिपोर्टिंग के लिए एक व्यक्ति किसी गांव में जाता है और वो अपनी पढ़ी लिखी विशुद्ध साहित्य भाषा या फिर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करता है तो ग्रामीण जनमानस उसे सहजता से नहीं स्वीकार पाता और आधी अधूरी जानकारी या ख़बर हाथ लगती है किंतु अगर क्षेत्र की प्रचलित भाषा /बोली को प्रयोग करें तो लोग जल्दी घुलमिल जाते हैं और उनसे संवाद सहज होता है अपनत्व भाव भी पनपता है इस आधार पर परिणाम ज्यादा अच्छे मिलते हैं।
 इसी तरह जब हम बदलते भारत में स्वरोजगार को प्रोत्साहित कर व्यापार के क्षेत्र में नई पारी की शुरुआत कर रहे हों तो प्रयोजन मूलक हिंदी की भूमिका बहुत प्रभावशाली हो जाती है। क्योंकि लघु कुटीर उद्योगों को  जन जीवन की भाषा में ही जनजीवन तक पहुंचाया जा सकता है। सम्प्रेषण के लिए भाषा / बोली कि उपयोगिता तो व्यापार में भी है। कोई भी व्यापार या बाजार सम्प्रेषण कला के बिना सम्भव नहीं ,जैसे मोल भाव  में ही देखिए कि सरल और सहज हिंदी ही हम प्रयोग करते हैं। आज इंटरनेट की दुनिया में भी व्यापार को बढ़ाने के लिए संवाद और सम्प्रेषण की आवश्यकता पड़ती है वहां भी सामान्य और सरल हिंदी में अपने व्यापार की जानकारी अधिक लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए प्रयोजनमूलक हिंदी व्यापारिक दृष्टि कोण से भी उन्नति के मार्ग प्रशस्त करती है।
              भूमंडलीकरण के इस दौर में महिलाओं की उन्नति की बात करें तो वर्षों से उनकी हस्तकला जो घर की सजावट का हिस्सा रही वो अब स्वरोजगार के विकल्प के रूप में उभरकर संचार व्यवस्था से तालमेल बिठाती हुई प्रयोजनमूलक हिंदी के सहयोग से आर्थिक स्वावलम्बन का आधार बन रही है।   जो महिलाओं की आर्थिक दशा को उन्नत करने में महत्वपूर्ण कदम है। प्रयोजनमूलक हिंदी ने गली मोहल्ले हाट बाजार के साथ सोशल मीडिया पर भी व्यापार से लेकर कला ,साहित्य, अभिव्यक्ति के संचार में सशक्त भूमिका अदा करते हुए अपना वर्चस्व स्थापित किया है। इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रयोजनमूलक हिंदी  किसी भी तरह से संचार के लिए प्राणदायिनी हवा की भांति है जो जीवन को सांसों की तरह लयबद्ध करती है।
विश्व संचार दिवस पर सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं  

लेखक- शालिनी सिंह(एंकर-आकाशवाणी लखनऊ)

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